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आज की अमृत कथा 🌹 संन्यासी बड़ा या गृहस्थ

  आज की अमृत कथा 🌹 संन्यासी बड़ा या गृहस्थ 🌹 किसी नगर में एक राजा रहता था, उस नगर में जब कोई संन्यासी आता तो राजा उसे बुलाकर पूछता कि- ”भगवान ! गृहस्थ बड़ा है या संन्यास ?” अनेक साधु अनेक प्रकार से इसको उत्तर देते थे। कई संन्यासी को बड़ा तो बताते पर यदि वे अपना कथन सिद्ध न कर पाते तो राजा उन्हें गृहस्थ बनने की आज्ञा देता। जो गृहस्थ को उत्तम बताते उन्हें भी यही आज्ञा मिलती। इस प्रकार होते-होते एक दिन एक संन्यासी उस नगर में आ निकला और राजा ने बुलाकर वही अपना पुराना प्रश्न पूछा। संन्यासी ने उत्तर दिया- “राजन। सच पूछें तो कोई आश्रम बड़ा नहीं है, किन्तु जो अपने नियत आश्रम को कठोर कर्तव्य धर्म की तरह पालता है वही बड़ा है।” राजा ने कहा- “तो आप अपने कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिये।“ संन्यासी ने राजा की यह बात स्वीकार कर ली और उसे साथ लेकर दूर देश की यात्रा को चल दिया। घूमते-घूमते वे दोनों एक दूसरे बड़े राजा के नगर में पहुँचे, उस दिन वहाँ की राज कन्या का स्वयंवर था, उत्सव की बड़ी भारी धूम थी। कौतुक देखने के लिये वेष बदले हुए राजा और संन्यासी भी वहीं खड़े हो गये। जिस राजकन्या का स्वयंवर था, ...

प्रणाम का महत्व

  *महाभारत का युद्ध चल रहा था - एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि -* *"मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"* *उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई -* *भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए।* *तब -श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -* *श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -* *शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -* *द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने* *"अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!* *"वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्रीकृष्ण यहाँ लेकर आये है" ?* *तब द्रोपदी ने कहा कि -"हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं" तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया -* *भीष्म ने कहा - "मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने क...

संसार सुखों की अनिमियता

  किसी नगरमें एक गृहस्थके घर एक गाय पली थी। एक दिन उस गायका बछड़ा बहुत उदास हो रहा था। वह समयपर माताके स्तनोंमें मुख लगाकर दूध पीनेमें भी उस दिन उत्साह नहीं दिखला रहा था। गायने अपने बच्चेकी यह दशा देखकर पूछा - 'बेटा! आज तुम इतने उदास क्यों हो ? उत्साहपूर्वक दूध क्यों नहीं पीते हो ?' बछड़ा बोला- 'माँ! तुम उस भेड़ेकी ओर तो देखो। वह काला-कलूटा है, मुझसे छोटा है और सुस्त भी है; किंतु अपने स्वामीका पुत्र उसे कितना प्यार करता है। उसे वह रोटी खिलाता है, हरी-हरी घास देता है, मटरकी फलियाँ अपने हाथोंसे खिलाता है और उसे पुचकारता है। उस भेड़ेको स्वामीके पुत्रने घंटियाँ पहनायी हैं और उसके सींगोंमें प्रतिदिन तेल लगाता है। दूसरी ओर मुझ अभागेकी कोई पूछ ही नहीं। मुझे पेटभर सूखी घास भी नहीं दी जाती। समयपर कोई मुझे पानीतक नहीं पिलाता। मुझमें ऐसा क्या दोष है ? मैंने कौन-सा अपराध किया है ?' गाय बोली- 'बेटा! व्यर्थ दुःख मत करो। यह संसार ऐसा है कि यहाँ बहुत सुख और बहुत सम्मान मिलना बड़े भयकी बात है। संसारके सुख और सम्मानके पीछे रोग, शोक, मृत्यु तथा पतन छिपे हैं। तुम लोभ मत...