जैसे कर्म बैसा फल
बात बड़ी सामान्य और छोटी सी लेकिन समझने लायक है। सब जानते हैं कि भगवान विष्णु जी ही माँ लक्ष्मी के स्वामी हैं। अर्थात् सरल अर्थों में समझा जाए तो वह ये कि, जिस भी धन और संपत्ति को हम अपना समझ बैठे हैं, उसके वास्तविक पति तो केवल और केवल स्वयं भगवान नारायण ही हैं। जिस प्रकार लक्ष्मी पर अपना एकाधिकार जताने के प्रयास में दुर्बुद्धि रावण को अपना सर्वनाश देखना पड़ा, ठीक इसी प्रकार प्रभु द्वारा प्रदत्त संपत्ति का सदुपयोग न कर उसे अपना समझकर भोग और विलासिता में व्यय करना अपनी अल्प बुद्धि का परिचय देते हुए अपने विनाश को निमंत्रण देना ही है। जिस दिन लक्ष्मी पर हमारी भोग दृष्टि पड़ जाती है उस दिन पहले सन्मत्ति और फिर संपत्ति का हरण प्रभु द्वारा कर लिया जाता है। इसलिए सम्पत्ति को प्रभु कार्य में, नारायण की सेवा में और परमार्थ में ख़र्च करना ही उसकी सार्थकता है।
यह इस प्रकृति का एक शास्वत नियम है यहाँ सदैव एक दूसरे द्वारा अपने से दुर्बलों को ही सताया जाता है। और अक्सर अपने से बलवानों को उनसे कुछ गलत होने के बावजूद भी छोड़ दिया जाता है। दुःख के साथ भी ऐसा होता है जितना आप दुखों से भागने का प्रयास करोगे उतना दुःख तुम्हारे ऊपर हावी होते जायेंगे। स्वामी विवेकानंद जी कहा करते थे कि दुःख बंदरों की तरह होते हैं जो पीठ दिखाने पर पीछा किया करते हैं और सामना करने पर भाग जाते हैं। समस्या चाहे कितनी बड़ी क्यों ना हो मगर उसका कोई न कोई समाधान तो अवश्य ही होता है। समस्या का डटकर सामना करना सीखो क्योंकि समस्या मुकाबला करने से दूर होगी मुकरने से नहीं।
जिस प्रकार एक वैद्य के द्वारा दो अलग-अलग रोग के रोगियों को अलग अलग दवा दी जाती है। किसी को मीठी तो किसी को अत्याधिक कड़वी दवा दी जाती है। लेकिन दोनों के साथ भिन्न-भिन्न व्यवहार किये जाने के बावजूद भी उसका उद्देश्य एक ही होता है, रोगी को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करना। ठीक इसी प्रकार उस ईश्वर द्वारा भी भले ही देखने में भिन्न-भिन्न लोगों के साथ भिन्न-भिन्न व्यवहार नजर आये मगर उसका भी केवल एक ही उद्देश्य होता है और वह है, कैसे भी हो मगर जीव का कल्याण करना। सुदामा को अति दरिद्र बनाकर तारा, तो राजा बलि को सम्राट बनाकर तारा। शुकदेव जी को परम ज्ञानी बनाकर तारा, तो विदुर जी को प्रेमी बना कर। पांडवों को मित्र बना कर तारा, व कौरवों को शत्रु बनाकर। स्मरण रहे, भगवान केवल क्रिया से भेद करते हैं भाव से नहीं।
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🪔 "जय जय श्री राधे"🪔
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