चमड़े का पानी

 *काशी नरेश कई बार रैदास जी के दर्शन करने उनकी कुटिया पर आते थे! एक बार रैदास जी ध्यान में बैठे थे मानसी सेवा कर रहे थे और अपना काम भी कर रहे थे- काशी नरेश ने प्रणाम किया और कुछ देर बैठे- और जब चलने को हुए तो प्रशाद तो रैदास जी के पास चमड़ा धोने का जो एक पात्र जिसमे जल भरा रहता था- उसमें से अंजलि भर के जल काशी नरेश को दिया*

*राजा ने जल ले तो लिया लेकिन अब करें क्या चमड़े का पानी अब पिये कैसे और फेंके भी कैसे..? तो करें क्या तो राजा ने पीने का नाटक किया और हाथ ऊपर उठाकर अंजलि का जल मूँह में नही डाला सारा जल कोट की बांह में अंदर कर लिया*

*बात आई गई हो गयी कोट में जब उसके लाल दाग आगये तो राजा ने कोट धोने को दिया धोभी जब धो रहा था तो दाग जा नही रहा था धोबी ने दाग दांत से खुर्चने की कोशिश की तो धोबी को एक दम से भावावेष आगया धोबी तो पागल हो गया नाचने लगा*

*काशी नरेश के पास बात पहुँची- तो वह समझ गए भूल हो गयी, काशी नरेश फिर रैदास जी कुटिया पर पहुँचे- और कहा रैदास जी वो चरणामृत चाहिये, ठाकुर जी का! रैदास जी ने कहा: राजा साहब अब तो ये चमड़े का पानी है । चरणामृत तो ये उसी समय था- जब मैने आपको दिया था - अब तो ये चमड़े का पानी है केवल..*

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