भगवान श्री कृष्ण का पांचवा विश्वरुप प्रकटीकरण

 महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था। भगवान श्रीकृष्ण पांडवों से विदा लेकर द्वारका लौट रहे थे। मार्ग में उन्हें उत्तंक मुनि मिले। श्रीकृष्ण ने मुनि की पूजा की। मुनि ने श्रीकृष्ण से कहा - क्या तुम कौरवों और पांडवों के घर जाकर उनमें मेल कर आए ?

तब श्रीकृष्ण ने कहा - मैंने दुर्योधन को समझाने का बहुत प्रयास किया , परंतु वह नहीं माना। फलस्वरुप महायुद्ध हुआ। प्राय: सारे लोग मारे गए। कुछ लोग ही बच पाए।

श्रीकृष्ण के इस बात को सुनकर मुनि उत्तंक क्रोध में भर गए और बोले - हे मधुसूदन ! तुम चाहते , तो कुरुकुल को ध्वंस होने से बचा सकते थे। तुमने उपेक्षा की। इसी से सब मारे गए। अतः मैं तुम्हें शाप दूंगा -

" त्वां शपस्यामि मधुसूदन। "

मुनि की बात सुनकर श्री कृष्ण ने कहा - हे मुनिवर ! मैं जानता हूं कि आप तपस्वी हैं , परंतु थोड़ा-सा तप करके मेरा तिरस्कार कोई नहीं कर सकता -

" न च मां तपसाल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान्। "

मैं आपका तप नष्ट करना नहीं चाहता।

तब मुनि ने कहा - हे जनार्दन! तुम मुझे अध्यात्म-तत्व की बातें सुनाओ। उन्हें सुनकर मैं तुम्हें या तो वरदान दूंगा या शाप दे दूंगा।

इसके उत्तर में श्रीकृष्ण ने अपने परमात्म स्वरुप का प्रभाव और रहस्य समझाते हुए कहा -

" सदसच्चैव यत्प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च।

अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम्।।

असच्च सदसच्चैव यद्विश्वं सदसत्परम्।

मत्त: परतरं नास्ति देवदेवात्सनासनात्।। "

अर्थ - जिसको लोग सत्-असत् , अव्यक्त-व्यक्त और अक्षर-क्षर कहते हैं , वह सब मेरा ही रूप है। सत्-असत् तथा असत् और सत् एवं असत् से भी परे जो विश्व है , वह सब मुझ सनातन देवदेव के सिवा और कुछ भी नहीं है।

ऐसी दिव्य-वाणी को सुनकर मुनि की आंखें खुल गईं और शाप देने का उनका विचार नष्ट हो गया। तब स्तुति करते हुए उन्होंने कहा -

यदि त्वनुग्रहं किंचित्त्वत्तोऽर्हामि जनार्दन।

द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय।।

हे जनार्दन ! यदि मुझे किंचित भी अपना अनुग्रह पाने योग्य समझते हैं , तो मुझे अपना ईश्वरीय रुप दिखलाइए। मैं आपके उस परम रूप को देखना चाहता हूं।

भगवान प्रसन्न हो गए और उन्होंने ऋषि को अपना विश्वरुप दिखलाया , जिसे महाभारत-युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन ने देखा था। विश्वम्भर के इस विश्वरुप में सारा विश्व दीख पड़ता था। हजारों सूर्यों के और अग्नि के समान उनका प्रकाश था।

ऐसे श्रेष्ठ अद्भुत रूप को देखकर ऋषि आश्चर्य में डूब गए और उन्होंने प्रार्थना की -

पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टुमिच्छामि शाश्वतम्।

भगवन् ! इस महान रूप को समेट कर मुझे अपना वही श्यामसुंदर मनोहर शाश्वत रूप फिर दिखलाइए।

भगवान ने फिर श्रीकृष्ण रुप से उन्हें दर्शन दिया।

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