शक्तिपीठ

 शिव ने एक आख़िरी बार उसे देखा जैसे समस्त संसार में देखने को और कुछ न बचा हो। शरीर जल गया था, घने केश किसी जले हुए झाड़ियों के गट्ठर से प्रतीत हो रहे थे। जिन आँखो में शिव को चंद्रमा से भी अधिक शीतलता मिलती थी वो झुलस चुकी थी।

विष्णु ने सुदर्शन संभालते हुए एक बार फिर विनती की,

“ शिव उसे मुक्ति दे दो..”

शिव बिलकुल स्थिर थे..एकदम शांत, ये प्रलय के आने से पहले की शांति नहीं थी वरण ये प्रलय के अंत के बाद का शून्य था जो की अनंतकाल तक सृष्टि को सालने वाला प्रतीत हो रहा था।

“किसकी मुक्ति विष्णु..?

अब और कितनी मुक्ति माँगी जायेगी मुझसे?”

अपने स्वभाव के विपरीत अब विष्णु असंयमित हो चुके थे। सृष्टि के पालक को सृष्टि को सुचारू करना ही था,

“ स्वयं को मुक्त करो शिव, सती को मुक्त करो। उसका जो अवशेष मात्र आपके पास है वो सती स्वयं नहीं,बस आपका दुःख है, एक निर्जीव काया के प्रति आपका मोह है उसे मुक्त करो शिव..”

रक्तरंजित क्षितिज को देखते हुए शिव अभी भी एकदम शांत थे। पलकों को क्षणिक विश्राम देते हुए जब उन्होंने दुबारा आँखे खोली तो वो दूर कैलाश को देख रहे थे जहां कुछ समय पहले तक वो और सती साथ रहे थे,

“दुःख, मोह, पीड़ा, मुक्ति..मुक्ति..” शिव ने लगभग बुदबुदाते हुए कहा,

“नहीं विष्णु नहीं! बस यही मुक्ति तो मैं इन्हें नहीं दे सकता। मुक्ति के कामना भर से मुक्ति नहीं मिल सकती; सृष्टि के होने तक सती को मुक्ति नहीं मिल सकती।

शिव की कैलाश से वापस लौटती आँखे अब विष्णु पर केंद्रित हो गई थी,

“ ये मृत्यु केवल सती की नहीं है, ये शिव की मृत्यु है, उसकी इच्छाओं की मृत्यु है, उसके तमाम मनोकामनाओं की मृत्यु है और एक सभ्यता पूरा संसार उन्ही इच्छाओं, उन्ही मनोकामनाओं के साथ इनसे बारंबार टकरायेंगी। अब मुक्ति संभव नहीं है विष्णु..”

सती को यथावत अपने कंधे पर लिए शिव पलट चुके थे।

सती की निर्जीव काया को देखते हुए श्री विष्णु के चेहरे पर एक शांति रूपक मुस्कान व्याप्त हो गई। वो समझ चुके थे कि शिव प्रचंड रूप में भी कल्याणकारी है। उनकी पीड़ा भी संसार के लिये वरदान है। उन्होंने शक्ति को मुक्त नहीं किया था बल्कि संसार को सौंप दिया था शक्तिपीठ के रूप में।

अपनी तर्जनी उँगली के पोरो से सुदर्शन को मुक्त करते हुए उन्होंने शिव के लिए, सती के लिए और पूरे संसार के लिये उद्घोष किया,

“ तथास्तु..”

शास्‍त्रों के अनुसार महादेव को पीड़ा से मुक्त करने के लिए और सृष्टि को सुचारू करने के लिए श्री विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सती के अंग को पृथ्वी लोक पर काट गिराते है। इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, उनके वस्त्र या आभूषण गिरे , वहां-वहां शक्तिपीठ का उदय हुआ. इस तरह कुल 51 स्थानों में माता के शक्तिपीठों का निर्माण हुआ

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