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उधार

बाहर बारिश हो रही थी और अन्दर क्लास चल रही थी, तभी टीचर ने बच्चों से पूछा कि अगर तुम सभी को 100-100 रुपये दिए जाए तो तुम सब क्या क्या खरीदोगे? किसी ने कहा कि मैं वीडियो गेम खरीदुंगा। किसी ने कहा मैं क्रिकेट का बेट खरीदुंगा। किसी ने कहा कि मैं अपने लिए प्यारी सी गुड़िया खरीदुंगी, तो किसी ने कहा मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी। एक बच्चा कुछ सोचने में डुबा हुआ था। टीचर ने उससे पुछा कि तुम क्या सोच रहे हो? तुम क्या खरीदोगे? बच्चा बोला कि टीचर जी, मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता हैं तो मैं अपनी माँ के लिए एक चश्मा खरीदूंगा। टीचर ने पूछा, तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो तुम्हारे पापा भी खरीद सकते हैं, तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना? बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर का भी गला भर आया। बच्चे ने कहा कि मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं है। मेरी माँ लोगों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती हैं और कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े नहीं सिल पाती है इसीलिए मैं मेरी माँ को चश्मा देना चाहता हुँ ताकि मैं अच्छे से पढ़ सकूँ, बड़ा आदमी बन सकूँ और माँ को सारे सुख दे सकूँ। टीचर ने कहा, बेटा तेरी सोच ह...

योगिनी एकादशी व्रत कथा

  धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि भगवन, मैंने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के व्रत का माहात्म्य सुना। अब कृपया आषाढ़ कृष्ण एकादशी की कथा सुनाइए। इसका नाम क्या है? माहात्म्य क्या है? यह भी बताइए। श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है। यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। मैं तुमसे पुराणों में वर्णन की हुई कथा कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। स्वर्गधाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह शिव भक्त था और प्रतिदिन शिव की पूजा किया करता था। हेम नाम का एक माली पूजन के लिए उसके यहाँ फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य-विनोद तथा रमण करने लगा। इधर राजा उसकी दोपहर तक राह देखता रहा। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के न आने का कारण पता करो, क्योंकि वह अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया। सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी अतिकामी है...

गीता पढ़ने के दुर्लभ लाभ

  1 . जब हम पहली बार भगवत गीता पढ़ते हैं। तो हम एक अंधे व्यक्ति के रूप मे पढ़ते हैं बस इतानाही समझ मे आता हैं कि कौन किसके पिता, कौन किसकी बहन, कौन किसका भाई। बस इससे ज्यादा कुछ समझ मे नही आता। 2. जब दुसरी बार भगवत गीता पड़ते हैं तो हमारे मन मे सवाल जागते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया या उन्होंने वैसा क्यों किया। 3. जब तीसरी बार भगवत गीता को पड़ेंगे, तो हमें धीरे- धीरे उसके मतलब समझ मे आने शुरू हो जायेंगे। लेकिन हर एक को वो मतलब अपने तरीके से ही समझ मे आयेंगे। 4. जब चौथी बार हम भगवन गीता को पड़ेंगे, तो हर एक पात्र की जो भावनायें हैं, इमोशन... उसको आप समझ पायेंगे कि किसके मन मे क्या चल रहा हैं। जैसे अर्जुन के मन मे क्या चल रहा हैं या दुर्योधन के मन मे क्या चल रहा हैं। इसको हम समझ पायेंगे। 5. जब पाँचवी बार हम भगवत गीता को पड़ेंगे तो पूरा कुरूक्षेत्र हमारे मन मे खड़ा होता हैं, तैयार होता हैं, हमारे मन मे अलग- अलग प्रकार की कल्पनायें होती हैं। 6. जब हम छठी बार भगवत गीता को पढ़ते हैं, तब हमें ऐसा नही लगता कि हम पढ़ रहे हैं... हमें ऐसा ही लगता हैं कि कोई हमें बता रहा हैं। 7. जब सातवीं बार भगवत ग...

जैसे कर्म बैसा फल

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  बात बड़ी सामान्य और छोटी सी लेकिन समझने लायक है। सब जानते हैं कि भगवान विष्णु जी ही माँ लक्ष्मी के स्वामी हैं। अर्थात् सरल अर्थों में समझा जाए तो वह ये कि, जिस भी धन और संपत्ति को हम अपना समझ बैठे हैं, उसके वास्तविक पति तो केवल और केवल स्वयं भगवान नारायण ही हैं। जिस प्रकार लक्ष्मी पर अपना एकाधिकार जताने के प्रयास में दुर्बुद्धि रावण को अपना सर्वनाश देखना पड़ा, ठीक इसी प्रकार प्रभु द्वारा प्रदत्त संपत्ति का सदुपयोग न कर उसे अपना समझकर भोग और विलासिता में व्यय करना अपनी अल्प बुद्धि का परिचय देते हुए अपने विनाश को निमंत्रण देना ही है। जिस दिन लक्ष्मी पर हमारी भोग दृष्टि पड़ जाती है उस दिन पहले सन्मत्ति और फिर संपत्ति का हरण प्रभु द्वारा कर लिया जाता है। इसलिए सम्पत्ति को प्रभु कार्य में, नारायण की सेवा में और परमार्थ में ख़र्च करना ही उसकी सार्थकता है। यह इस प्रकृति का एक शास्वत नियम है यहाँ सदैव एक दूसरे द्वारा अपने से दुर्बलों को ही सताया जाता है। और अक्सर अपने से बलवानों को उनसे कुछ गलत होने के बावजूद भी छोड़ दिया जाता है। दुःख के साथ भी ऐसा होता है जितना आप दुखों से भागने का प्रय...

भक्त के बस में हैं भगवान

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वृन्दावन में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह बाँकेबिहारी से असीम प्यार करता था। वह बाँकेबिहारी का इतना दीवाना था कि सुबह शाम जब तक वह मन्दिर ना जाए उसे किसी भी काम में मन नहीं लगता था। मन्दिर में जब भी भंडारा होता वह प्रमुख रूप से भाग लेता।🍒 एक दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हो गई और जिस दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हुई उसी दिन ब्राह्मण की बाँकेबिहारी के मन्दिर में भी ड्यूटी लग गई। ब्राह्मण परेशान हो गया कि, वह करे तो क्या करे। 🍒 बेटी की शादी भी जरूरी है, और बाँकेबिहारी की आज्ञा भी ठुकरा नहीं सकता। ब्राह्मण ने सोचा कि अगर यह बात वह अपनी पत्नी से बताएगा, तो उसकी पत्नी नाराज हो जाएगी।🍒 वह कहेगी कि, कोई क्या अपनी बेटी की शादी भी छोड़ता है। एक दिन अगर तुम भंडारे में नहीं जाओगे, तो भंडारा रुक नहीं जाएगा। कोई और संभाल लेगा लेकिन बेटी की शादी दोबारा तो नहीं होगी।🍒 ब्राह्मण परेशान हो गया था वह जानता था कि कुछ भी हो जाएगा, उसकी पत्नी उसे भंडारे में जाने नहीं देगी। 🍒 लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था, वह अपने बाँकेबिहारी से नजरे नहीं चुरा सकता था। बेटी की शादी के दिन ब्राह्मण अपने घर में बिना ...

वृंदावन रज का चमत्कार

  श्री वृंदावन में एक विरक्त संत रहते थे जिनका नाम था पूज्य श्री सेवादास जी महाराज। श्री सेवादास जी महाराज ने अपने जीवन मे किसी भी वस्तु का संग्रह नही किया। एक लंगोटी, कमंडल, माला और श्री शालिग्राम जी इतना ही साथ रखते थे। 👣 एक छोटी सी कुटिया बना रखी थी जिसमे एक बड़ा ही सुंदर संदूक रखा हुआ था। संत जी बहुत कम ही कुटिया के भीतर बैठकर भजन करते थे, 👣 अपना अधिकतम समय वृक्ष के नीचे भजन मे व्यतीत करते थे। यदि कोई संत आ जाये तो कुटिया के भीतर उनका आसान लगा देते थे। एक समय वहाँ एक बदमाश व्यक्ति आया और उसकी दृष्टि कुटिया के भीतर रखी उस सुंदर संदुक पर पडी।👣 उसने सोचा कि अवश्य ही महात्मा को कोई खजाना प्राप्त हुआ होगा जिसे यहाँ छुपा रखा है। महात्मा को धन का क्या काम ? मौका पाते ही इसे चुरा लूँगा ।👣 एक दिन बाबाजी कुटिया के पीछे भजन कर रहे थे। अवसर पाकर उस चोर ने कुटिया के भीतर प्रवेश किया और संदुक को तोड़ मरोड़ कर खोला। 👣 उस संदुक के भीतर एक और छोटी संदुक रखी थी। चोर ने उस संदुक को भी खोला तब देखा कि उसके भीतर भी एक और छोटी संदुक रखी है। 👣 ऐसा करते-करते उसे कई संदुक प्राप्त हुए और अंत मे एक छो...

प्रभु का नाम गोविंदाक्यों पड़ा

  एक अत्यंत रोचक घटना है, माँ महालक्ष्मी की खोज में भगवान विष्णु जब भूलोक पर आए, तब यह सुंदर घटना घटी। . 💕भूलोक में प्रवेश करते ही, उन्हें भूख एवं प्यास मानवीय गुण प्राप्त हुए, भगवान श्रीनिवास ऋषि अगस्त्य के आश्रम में गए और बोले... . 💕मुनिवर मैं एक विशिष्ट कार्य से भूलोक पर (पृथ्वी) पर आया हूँ और कलयुग का अंत होने तक यहीं रहूँगा। . 💕मुझे गाय का दूध अत्यंत पसंद है, और मुझे अन्न के रूप में उसकी आवश्यकता है। मैं जानता हूँ कि आपके पास एक बड़ी गौशाला है, उसमें अनेक गाएँ हैं, मुझे आप एक गाय दे सकते हैं क्या ? . 💕ऋषि अगस्त्य हँसे और कहने लगे, स्वामी मुझे पता है कि आप श्रीनिवास के मानव स्वरूप में, श्रीविष्णु हैं। . 💕मुझे अत्यंत आनंद है कि इस विश्व के निर्माता और शासक स्वयं मेरे आश्रम में आए हैं, मुझे यह भी पता है की आपने मेरी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए यह मार्ग अपनाया है... . 💕फिर भी स्वामी, मेरी एक शर्त है कि मेरी गौशाला की पवित्र गाय केवल ऐसे व्यक्ति को मिलनी चाहिए जो उसकी पत्नी संग यहाँ आए... . 💕मुझे आप को उपहार स्वरूप गाय देना अच्छा लगेगा, परंतु जब तुम मेरे आश्रम में देवी लक्ष...