गुरु-कृपा
एक सन्त अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुँचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा- “मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है। आप चाहें तो वहाँ रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा।” वह सन्त अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहाँ के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी सन्त को दीवार में एक दरार नजर आई। सन्त उस दरार के पास पहुँचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए। शिष्य के कारण पूछने पर सन्त ने कहा-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।” अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुँचे। किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बाँटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए। सवेरा होने पर सन्त व उनके शि...