Posts

गुरु-कृपा

  एक सन्त अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुँचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा- “मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है। आप चाहें तो वहाँ रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा।” वह सन्त अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहाँ के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी सन्त को दीवार में एक दरार नजर आई। सन्त उस दरार के पास पहुँचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए। शिष्य के कारण पूछने पर सन्त ने कहा-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।” अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुँचे। किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बाँटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए। सवेरा होने पर सन्त व उनके शि...

कर भला हो भला

  एक माँ थी उसका एक बेटा था। माँ-बेटे बड़े गरीब थे। . एक दिन माँ ने बेटे से कहा – बेटा !! यहाँ से बहुत दूर तपोवन में एक दिगम्बर मुनि पधारे हैं वे बड़े सिद्ध पुरुष हैं और महाज्ञानी हैं। . तुम उनके पास जाओ और पूछो कि हमारे ये दु:ख के दिन और कब तक चलेंगे। इसका अंत कब होगा। . बेटा घर से चला। पुराने समय की बात है, यातायात की सुविधा नहीं थी। वह पद यात्रा पर था। . चलते-चलते सांझ हो गई। गाँव में किसी के घर रात्रि विश्राम करने रुक गया। . सम्पन्न परिवार था। सुबह उठकर वह आगे की यात्रा पर चलने लगा तो घर की सेठानी ने पूछा – बेटा कहाँ जाते हो ? . उसने अपनी यात्रा का कारण सेठानी को बताया। तो सेठानी ने कहा – बेटा एक बात मुनिराज से मेरी भी पूछ आना कि मेरी यह इकलौती बेटी है, वह बोलती नहीं है। गूंगी है। वह कब तक बोलेगी ? तथा इसका विवाह किससे होगा ? . उसने कहा – ठीक है और वह आगे बढ़ गया। . रास्ते में उसने एक और पड़ाव डाला। अबकी बार उसने एक संत की कुटिया में पड़ाव डाला था। . विश्राम के पश्चात्‌ जब वह चलने लगा तो उस संत ने भी पूछा – कहाँ जा रहे हो ? उसने संत श्री को भी अपनी यात्रा...

सत्संग के महत्व

  जय श्री मन नारायण……….. एक संत के आश्रम में प्रतिदिन शाम को,भक्तों की भीड़ होती थी, क्योंकि उनके प्रवचनों से जीवन का सही दिशा और बोध प्राप्त होता था... एक युवक प्रतिदिन संत का प्रवचन सुनता था, एक दिन जब प्रवचन समाप्त हो गए, तो वह संत के पास गया और बोला, महाराज, मैं काफी दिनों से आपके प्रवचन सुन रहा हूं, किंतु यहां से जाने के बाद मैं अपने गृहस्थ जीवन में वैसा सदाचरण नहीं कर पाता जैसा यहां से सुनकर जाता हूं, इससे सत्संग के महत्व पर शंका भी होने लगती है, बताइए, मैं क्या करूं? संत ने युवक को बांस की एक टोकरी देते हुए उसमें पानी भरकर लाने के लिए कहा, युवक टोकरी में जल भरने में असफल रहा, संत ने यह कार्य निरंतर जारी रखने के लिए कहा, युवक प्रतििदन टोकरी में जल भरने का प्रयास करता, किंतु सफल नहीं हो पाता... कुछ दिनों बाद संत ने उससेे पूछा, इतने दिनों से टोकरी में लगातार जल डालने से क्या टोकरी में कोई फर्क नजर आया? युवक बोला, एक फर्क जरूर नजर आया, पहले टोकरी के साथ मिट्टी जमा होती थी, अब वह साफ दिखाई देती है, कोई गंदगी नहीं दिखाई देती और इसके छेद पहले जितने बड़े नहीं रह गए, वे बहुत छोटे हो गए...

गौ सेवा

  आज से लगभग 8 हजार वर्ष पूर्व त्रेता युग में अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट महाराज दिलीप के कोई संतान नहीं थी। एक बार वे अपनी पत्नी के साथ गुरु वसिष्ठ के आश्रम गए। गुरु वसिष्ठ ने उनके अचानक आने का प्रयोजन पूछा। तब राजा दिलीप ने उन्हें अपने पुत्र पाने की इच्छा व्यक्त की और पुत्र पाने के लिए महर्षि से प्रार्थना की। महर्षि ने ध्यान करके राजा के निःसंतान होने का कारण जान लिया। उन्होंने राजा दिलीप से कहा, “राजन! आप देवराज इन्द्र से मिलकर जब स्वर्ग से पृथ्वी पर आ रहे थे तो आपने रास्ते में खड़ी कामधेनु को प्रणाम नहीं किया। शीघ्रता में होने के कारण आपने कामधेनु को देखा ही नहीं, कामधेनु ने आपको शाप दे दिया कि आपको उनकी संतान की सेवा किये बिना आपको पुत्र नहीं होगा।” महाराज दिलीप बोले, “गुरुदेव! सभी गायें कामधेनु की संतान हैं। गौ सेवा तो बड़े पुण्य का काम है, मैं गायों की सेवा जरुर करूँगा।” गुरु वसिष्ठ ने कहा, “राजन! मेरे आश्रम में जो नंदिनी नाम की गाय है, वह कामधेनु की पुत्री है। आप उसी की सेवा करें।” महाराज दिलीप सबेरे ही नंदिनी के पीछे पीछे वन में गए, वह जब खड़ी होती तो राजा दिलीप भी खड़े रहते, ...

मन

  सुशील नाम के एक ब्राह्मण थे। उनके दो पुत्र थे। बड़े का नाम था सुवृत्त और छोटे का वृत्त। दोनों युवा थे। दोनों गुणसम्पन्न तथा कई विद्याओं में विशारद थे। घूमते-घामते दोनों एक दिन प्रयाग पहुँचे। उस दिन श्रीकृष्णजन्माष्टमी थी। इसलिये श्रीबेणीमाधवजी के मन्दिर में महान् उत्सव था। महोत्सव देखने के लिये वे दोनों भी निकले। वे लोग सड़क पर निकले ही थे कि बड़े जोर की वर्षा आ गयी, इसलिये दोनों भाई मार्ग भूल गये। किसी निश्चित स्थान पर उनका पहुँचना कठिन था। अतएव एक तो वेश्या के घर में चला गया, दूसरा भूलता-भटकता माधवजी के मन्दिर में जा पहुँचा। सुवृत्त चाहता था कि वृत्त भी उसके साथ वेश्या के यहाँ ही रह जाय, पर वृत्त ने इसे स्वीकार नहीं किया। वह माधवजी के मन्दिर में पहुँचा भी, पर वहाँ पहुँचने पर उसके संस्कार बदले और वह लगा पछताने। वह मन्दिर में रहते हुए भी सुवृत्त और वेश्या के ध्यान में डूब गया। वहाँ भगवान् की पूजा हो रही थी। वृत्त उसे सामने से ही खड़ा देख रहा था। पर वह वेश्या के ध्यान में ऐसा तल्लीन हो गया था कि वहाँ की पूजा, कथा, नमस्कार, स्तुति, पुष्पाञ्जलि, गीत-नृत्यादि को देखते-सुनते हुए भी न ...

नल-दमयन्ती के पूर्वजन्म का वृत्तान्त

  पूर्वकाल में आबू पर्वत के समीप एक आहुक नाम का भील रहता था। उसकी पत्नी का नाम आहुजा था। वह बड़ी पतिव्रता तथा धर्मशीला थी। वे दम्पति बड़े शिवभक्त एवं अतिथि सेवक थे। एक बार भगवान् शंकर ने इनकी परीक्षा लेने का विचार किया। वे एक यति का रूप धारण करके संध्या-समय आहुक के दरवाजे पर जाकर कहने लगे–‘भील! तुम्हारा कल्याण हो, मैं आज रात भर यहीं रहना चाहता हूँ, तुम दया करके एक रात मुझे रहने के लिये स्थान दे दो।’ इस पर भील ने कहा–‘स्वामिन् ! मेरे पास स्थान बहुत थोड़ा है, उसमें आप कैसे रह सकते हैं ?’ यह सुनकर यति चलने को ही थे कि पत्नी ने पति से कहा–‘स्वामिन् ! यति को लौटाइये नहीं, गृहस्थधर्म का विचार कीजिये, इसलिये आप दोनों तो घर के भीतर रहें, मैं अपनी रक्षा के लिये कुछ बड़े शस्त्रों को लेकर दरवाजे पर बैठी रह जाऊँगी।’ भील ने सोचा कि यह बात तो ठीक ही कहती है, परन्तु इसे बाहर रखकर मेरा घर में रहना ठीक नहीं; क्योंकि यह अबला है। अतएव उसने यति तथा अपनी पत्नी को घर के भीतर रखा और स्वयं शस्त्र धारणकर बाहर बैठा रहा। रात बीतने पर हिंस्र पशुओं ने उस पर आक्रमण किया और उसे मार डाला। प्रातः ...

हनुमानचालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र एक बार जरूर पढ़े जय श्री राम

  कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है। पर क्या आप जानते हैं कि श्री हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है। माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से पूर्व किया था हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की। अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं। हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई। हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं…. शुरुआत गुरु से… हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है… श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। अर्थ - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं। गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है...