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Showing posts from December, 2023

सफलता का रहस्य

  (( सफलता का रहस्य )))) . एक आठ साल का लड़का गर्मी की छुट्टियों में अपने दादा जी के पास गाँव घूमने आया। . एक दिन वो बड़ा खुश था, उछलते-कूदते वो दादाजी के पास पहुंचा और बड़े गर्व से बोला, ”मैं बड़ा होकर बहुत सफल आदमी बनना चाहता हूं। क्या आप मुझे सफल होने के कुछ टिप्स दे सकते हैं?” . दादा जी ने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया, और बिना कुछ कहे लड़के का हाथ पकड़ा और उसे करीब की पौधशाला में ले गए। . वहां जाकर दादा जी ने दो छोटे-छोटे पौधे खरीदे और घर वापस आ गए। . वापस लौट कर उन्होंने एक पौधा घर के बाहर लगा दिया और एक पौधा गमले में लगा कर घर के अन्दर रख दिया। . “क्या लगता है तुम्हे, इन दोनों पौधों में से भविष्य में कौन सा पौधा अधिक सफल होगा?”, दादा जी ने लड़के से पूछा। . लड़का कुछ क्षणों तक सोचता रहा और फिर बोला, ” घर के अन्दर वाला पौधा ज्यादा सफल होगा क्योंकि वो हर एक खतरे से सुरक्षित है जबकि बाहर वाले पौधे को तेज धूप, आंधी-पानी, और जानवरों से भी खतरा है…” . दादाजी बोले, ”चलो देखते हैं आगे क्या होता है !”, और वह अखबार उठा कर पढने लगे। . कुछ दिन बाद छुट्टियाँ ख़तम हो गयीं और वो लड़का वापस शहर चला गया। इस ...

लक्ष्मण ने सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को मार डाला, इसलिए वह सबसे महान योद्धा बन गये।

  14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान राम वापस अयोध्या आये तो अगस्त्य ऋषि उनसे मिलने आये और लंका युद्ध की चर्चा छिड़ गयी। भगवान राम ने उन्हें बताया कि कैसे उन्होंने रावण और कुंभकर्ण जैसे उग्र नायकों को मार डाला और लक्ष्मण ने इंद्रजीत और अतिकाय जैसे कई शक्तिशाली असुरों को भी मार डाला। तब अगस्त्य ऋषि ने कहा, 'बेशक रावण और कुंभकर्ण बहुत वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा असुर मेघनाद (इंद्रजीत) था। उसने स्वर्ग में देवराज इन्द्र से युद्ध किया और उन्हें बाँधकर लंका ले आया। जब ब्रह्मा ने मेघनाद से उसे छोड़ने के लिए कहा तो इंद्र को मुक्त कर दिया गया। लक्ष्मण ने सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को मार डाला, इसलिए वह सबसे महान योद्धा बन गये। अगस्त्य ऋषि से भाई की वीरता की प्रशंसा सुनकर भगवान राम बहुत प्रसन्न हुए, लेकिन उनके मन में यह जिज्ञासा उठ रही थी कि अगस्त्य ऋषि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से भी अधिक कठिन था। भगवान राम की जिज्ञासा को शांत करने के लिए, अगस्त्य ऋषि ने कहा, "इंद्रजीत को वरदान था कि उसे कोई ऐसा व्यक्ति मार सकता है जो 12 वर्षों तक सोया नहीं था, जिसने 12 वर्षों तक किसी महिला का ...

गरीब किसान की लौकियाँ

  गरीब किसान के खेत में बिना बोये लौकी का पौधा उग आया। बड़ा हुआ तो उसमे तीन लौकियाँ लगीं। उसने सोचा, उन्हें बाजार में बेचकर घर के लिए कुछ सामान ले आएगा. अतः वो तीन लौकियाँ लेकर गाँव के बाजार में गया और बेचने के यत्न से एक किनारे बैठ गया। गांव के प्रधान आये, पूछा , " लौकी कितने की है?" " मालिक, दस रुपये की। " उसने दीनता से कहा। लौकी बड़ी थी। प्रधान ने एक लौकी उठायी और ये कहकर चलता बना," बाद में ले लेना। " इसी प्रकार थाने का मुंशी आया और दूसरी लौकी लेकर चलता बना। किसान बेचारा पछता कर रह गया। अब एक लौकी बची थी। भगवन से प्रार्थना कर रहा था कि ये तो बिक जाये, ताकि कुछ और नहीं तो बच्चों के लिए पतासे और लइया ही लेता जायेगा। तभी उधर से दरोगा साहब गुज़रे। नज़र इकलौती लौकी पर पड़ी देखकर कडककर पूछा , " कितने की दी ?" किसान डर गया। अब यह लौकी भी गई। सहमकर बोला ," मालिक, दो तो चली गयीं , इसको आप ले जाओ। " " क्या मतलब ?" दरोगा ने पूछा, " साफ़ - साफ़ बताओ ?" किसान पहले घबराया, फिर डरते - डरते सारा वाक़्या बयान कर दिया। दरोगा जी हँसे। वो कि...

चमड़े का पानी

  *काशी नरेश कई बार रैदास जी के दर्शन करने उनकी कुटिया पर आते थे! एक बार रैदास जी ध्यान में बैठे थे मानसी सेवा कर रहे थे और अपना काम भी कर रहे थे- काशी नरेश ने प्रणाम किया और कुछ देर बैठे- और जब चलने को हुए तो प्रशाद तो रैदास जी के पास चमड़ा धोने का जो एक पात्र जिसमे जल भरा रहता था- उसमें से अंजलि भर के जल काशी नरेश को दिया* *राजा ने जल ले तो लिया लेकिन अब करें क्या चमड़े का पानी अब पिये कैसे और फेंके भी कैसे..? तो करें क्या तो राजा ने पीने का नाटक किया और हाथ ऊपर उठाकर अंजलि का जल मूँह में नही डाला सारा जल कोट की बांह में अंदर कर लिया* *बात आई गई हो गयी कोट में जब उसके लाल दाग आगये तो राजा ने कोट धोने को दिया धोभी जब धो रहा था तो दाग जा नही रहा था धोबी ने दाग दांत से खुर्चने की कोशिश की तो धोबी को एक दम से भावावेष आगया धोबी तो पागल हो गया नाचने लगा* *काशी नरेश के पास बात पहुँची- तो वह समझ गए भूल हो गयी, काशी नरेश फिर रैदास जी कुटिया पर पहुँचे- और कहा रैदास जी वो चरणामृत चाहिये, ठाकुर जी का! रैदास जी ने कहा: राजा साहब अब तो ये चमड़े का पानी है । चरणामृत तो ये उसी समय था- जब मैने आपको ...

भगवान श्री कृष्ण का पांचवा विश्वरुप प्रकटीकरण

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  महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था। भगवान श्रीकृष्ण पांडवों से विदा लेकर द्वारका लौट रहे थे। मार्ग में उन्हें उत्तंक मुनि मिले। श्रीकृष्ण ने मुनि की पूजा की। मुनि ने श्रीकृष्ण से कहा - क्या तुम कौरवों और पांडवों के घर जाकर उनमें मेल कर आए ? तब श्रीकृष्ण ने कहा - मैंने दुर्योधन को समझाने का बहुत प्रयास किया , परंतु वह नहीं माना। फलस्वरुप महायुद्ध हुआ। प्राय: सारे लोग मारे गए। कुछ लोग ही बच पाए। श्रीकृष्ण के इस बात को सुनकर मुनि उत्तंक क्रोध में भर गए और बोले - हे मधुसूदन ! तुम चाहते , तो कुरुकुल को ध्वंस होने से बचा सकते थे। तुमने उपेक्षा की। इसी से सब मारे गए। अतः मैं तुम्हें शाप दूंगा - " त्वां शपस्यामि मधुसूदन। " मुनि की बात सुनकर श्री कृष्ण ने कहा - हे मुनिवर ! मैं जानता हूं कि आप तपस्वी हैं , परंतु थोड़ा-सा तप करके मेरा तिरस्कार कोई नहीं कर सकता - " न च मां तपसाल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान्। " मैं आपका तप नष्ट करना नहीं चाहता। तब मुनि ने कहा - हे जनार्दन! तुम मुझे अध्यात्म-तत्व की बातें सुनाओ। उन्हें सुनकर मैं तुम्हें या तो वरदान दूंगा या शाप दे दूंगा। इसके उत्तर म...

राम आयेंगे

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  *जय श्री राम*•••••••••• मेरी झोपड़ी के भाग आज जाग जायेंगे .....राम आयेंगे ...।सुबह से यही भजन सुन रही। एक दो चार आठ बार।हर बार वही मधुरता। राम आयेंगे...राम आयेंगे। एक एक पंक्ति को सुनते हुए एहसास होता है राम का आना क्या है? यह विश्वास है। यह उम्मीद है। यह आशा है। राम आयेंगे एक सत्य है। राम आयेंगे एक चेतावनी है। राम आयेंगे एक प्रारब्ध है। संतान के सुख से वंचित मां कौशल्या कितने दिन ये सोच सोच कर विचलित हुई होंगी कि राम आयेंगे। राम आयेंगे तो भरेगी मेरी सुनी कोख। नारी को ईश्वर को जन्म देने का सौभाग्य मिलेगा। वह जननी बनेगी। राजा दशरथ श्रवण के माता पिता का श्राप सुनकर घबराने से ज्यादा अभिभूत हुए होंगे कि हां पुत्र वियोग होगा। यानी पुत्र होगा। यानी राम आयेंगे। ऋषि ब्राह्मण ऐसा ही करते हैं, उनके दंड, उनके श्राप भी ईश्वर कृपा के साक्षी बनते हैं। यज्ञ करते ऋषि मुनियों को भी प्रतीक्षा रही होगी कभी इन यज्ञों का फल मिलेगा। कभी राम आयेंगे। यज्ञ में अस्थि डालने वाले दैत्य भी सोचते होंगे कभी मुक्ति मिलेगी हमें, कभी राम आयेंगे। इस दृष्टि से देखता हूं तो दोनो के कर्म एक दूसरे के पूरक लगते हैं। दो...

हनुमानजी की अद्भुत पराक्रम भक्ति कथा

  जब रावण ने देखा कि हमारी पराजय निश्चित है तो उसने 1000 अमर राक्षसों को बुलाकर रणभूमि में भेजने का आदेश दिया। ये ऐसे थे जिनको काल भी नहीं खा सका था। विभीषण के गुप्तचरों से समाचार मिलने पर श्री राम को चिन्ता हुई कि हम लोग इनसे कब तक लड़ेंगे ? सीता का उद्धार और विभीषण का राज तिलक कैसे होगा ? क्योंकि युद्ध की समाप्ति असंभव है। श्रीराम कि इस स्थिति से वानरवाहिनी के साथ कपिराज सुग्रीव भी विचलित हो गए कि अब क्या होगा ? हम अनंत काल तक युद्ध तो कर सकते हैं पर विजयश्री का वरण नहीं ! पूर्वोक्त दोनों कार्य असंभव हैं। अंजनानंदन हनुमान जी आकर वानर वाहिनी के साथ श्रीराम को चिंतित देखकर बोले–'प्रभु ! क्या बात है ?' श्रीराम के संकेत से विभीषण जी ने सारी बात बतलाई। अब विजय असंभव है। पवन पुत्र ने कहा–'असम्भव को संभव और संभव को असम्भव कर देने का नाम ही तो हनुमान है। प्रभु ! आप केवल मुझे आज्ञा दीजिए मैं अकेले ही जाकर रावण की अमर सेना को नष्ट कर दूँगा।' 'परन्तु कैसे हनुमान ? वे तो अमर हैं'–श्रीरामजी ने कहा। ' प्रभु ! इसकी चिंता आप न करें, बस सेवक पर विश्वास करें'–हनुमान बोल...

भगवान् का दंड !!

  गया के आकाशगंगा पहाड़ पर एक परमहंस जी वास करते थे।एक दिन परमहंस जी के शिष्य ने एकादशी के दिन निर्जला उपवास करके द्वादशी के दिन प्रातः उठकर फल्गु नदी में स्नान किया। विष्णुपद का दर्शन करने में उन्हें थोड़ा विलम्ब हो गया। वे साथ में एक गोपाल जी को सर्वदा ही रखते थे। द्वादशी के पारण का समय बीतता जा रहा था, देखकर वे अधीर हो गये एवं शीघ्र एक हलवाई की दुकान में जाकर उन्होंने दुकानदार से कहा....पारण का समय निकला जा रहा है, मुझे कुछ मिठाई दे दो, गोपाल जी को भोग लगाकर मैं थोड़ा जल ग्रहण करुँगा। दुकानदार उनकी बात अनसुनी कर दी। साधु के तीन - चार बार माँगने पर भी हाँ ना कुछ भी उत्तर नहीं मिलने से व्यग्र होकर एक बताशा लेने के लिए जैसे ही उन्होने हाथ बढ़ाया, दुकानदार और उसके पुत्र ने साधु की खुब पिटाई की। निर्जला उपवास के कारण साधु दुर्बल थे, इस प्रकार के प्रहार से वे सीधे गिर पड़े। रास्ते के लोगों ने बहुत प्रयास करके साधु की रक्षा की। साधु ने दुकानदार से एक शब्द भी नहीं कहा, ऊपर की ओर देखकर थोड़ा हँसते हुए प्रणाम करके कहा-भली रे दयालु गुरुजी, तेरी लीला। केवल इतना कहकर साधु पहाड़ की ओर चले गये...

।। माँ लक्ष्मी का निवास कथा ।।

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  एक बार भगवान विष्णु जी शेषनाग पर बेठे बेठे बोर हो गये, ओर उन्होने धरती पर घूमने का विचार मन मै किया, वेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये, ओर वह अपनी यात्रा की तेयारी मे लग गये, स्वामी को तेयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा !! आज सुबह सुबह कहा जाने कि तेयारी हो रही है ?? . विष्णु जी ने कहा.. हे लक्ष्मी मै धरती लोक पर घुमने जा रहा हुं, तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मै भी आप के साथ चल सकती हुं ? . भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो, पर तुम धरती पर पहुच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना, इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी मनवा ली। . ओर सुबह सुबह मां लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुच गये, अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात को बरसात हो कर हटी थी, चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी, . उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी, ओर धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, ओर मां लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी, ओर भुल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है ? . ओर चारो ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नही चला। . उत्तर द...